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  सिद्धो की आवाज़ (शिडहोआक अरंग) "जो लोग इतिहास से नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।" – जॉर्ज सैंटायाना। यह कथन आज संताल समाज की सामाजिक स्थिति पर पूरी तरह लागू होता है। आज हज़ारों बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे पवित्र भूभाग से खनिज निकाल रही हैं—वह भूमि जो सिद्धो, कान्हू और लाखों संताल भाइयों-बहनों के बलिदान से सुरक्षित हुई थी। लेकिन ऐसा लगता है कि आधुनिक आदिवासी, विशेषकर संताल, इस इतिहास को भूल चुके हैं। क्या हम अपने महान नेताओं के शहादत को भूल चुके हैं? क्यों हमारे लोग आज भी गरीबी के दलदल में फँसे हुए हैं? क्यों कंपनियाँ लगातार हमारी ज़मीन हड़प रही हैं? क्यों तथाकथित दिक्कू हमारे ही घर में अमीर बनते जा रहे हैं और हम हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं? इन सवालों पर जब मैं सोचता हूँ तो मेरे मन में तूफ़ान उठता है। हमारे विकास में कमी कहाँ है? हमें पीछे खींचने वाली ताक़तें कौन हैं? हमारी दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार कौन है? क्या हमने कभी ठहर कर अपनी स्थिति पर ग़ौर किया है या फिर दुख को अपनी नियति मान लिया है? कुछ विद्वानों ने संतालों और आदिवासियों की पतन के कारण गिना...