सिद्धो की आवाज़ (शिडहोआक अरंग)
"जो लोग इतिहास से नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।" – जॉर्ज सैंटायाना।
यह कथन आज संताल समाज की सामाजिक स्थिति पर पूरी तरह लागू होता है। आज हज़ारों बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे पवित्र भूभाग से खनिज निकाल रही हैं—वह भूमि जो सिद्धो, कान्हू और लाखों संताल भाइयों-बहनों के बलिदान से सुरक्षित हुई थी। लेकिन ऐसा लगता है कि आधुनिक आदिवासी, विशेषकर संताल, इस इतिहास को भूल चुके हैं। क्या हम अपने महान नेताओं के शहादत को भूल चुके हैं? क्यों हमारे लोग आज भी गरीबी के दलदल में फँसे हुए हैं? क्यों कंपनियाँ लगातार हमारी ज़मीन हड़प रही हैं? क्यों तथाकथित दिक्कू हमारे ही घर में अमीर बनते जा रहे हैं और हम हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं?
इन सवालों पर जब मैं सोचता हूँ तो मेरे मन में तूफ़ान उठता है। हमारे विकास में कमी कहाँ है? हमें पीछे खींचने वाली ताक़तें कौन हैं? हमारी दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार कौन है? क्या हमने कभी ठहर कर अपनी स्थिति पर ग़ौर किया है या फिर दुख को अपनी नियति मान लिया है? कुछ विद्वानों ने संतालों और आदिवासियों की पतन के कारण गिनाए हैं—शराब का संस्कृतिकरण, दिक्कुओं पर अंधा भरोसा, अशिक्षा पर गर्व, व्यक्तिगत अविवेक, जलन और लालच।
शराब का बोझ
आज हमारे समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है अत्यधिक शराबखोरी का सांस्कृतिक स्वीकार। हमारे गाँवों में हम गर्व से कहते हैं पावरा गी हो सोरोस सा होर होपोन ताला रे, बाम नु खन चेکام तहें समाज ताला रे, जैसे शराब ही जीवन का आधार हो। पुरुष ही नहीं, महिलाएँ भी शराब बेचने में गर्व महसूस करती हैं। लेकिन यह आदत धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य, परिवार और आर्थिक रीढ़ को तोड़ रही है।
इतिहास हमें नशे की बुराइयों से सावधान करता है। ब्रिटिश साम्राज्य ने चीन में अफ़ीम को बढ़ावा दिया, जिससे पूरी जनता इसकी लत में फँस गई और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, शासन और समाज कमजोर हो गया। वही ज़हर आज संताल समाज में शराब के रूप में फैल रहा है। दुमका, साहिबगंज, पाकुड़, गोड्डा और हज़ारीबाग़ जैसे इलाकों में नशे में डूबे पुरुष ग़लत निर्णय लेते हैं और परिवार बर्बाद हो जाता है। अंततः उन्हें रोज़गार के लिए महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता है, जहाँ वे मज़दूरी करते-करते बंधुआ मज़दूर बन जाते हैं।
दिक्कुओं की दोस्ती का भ्रम
एक और कमजोरी है बाहरी लोगों पर अंधा विश्वास। कई संताल दिक्कुओं को अपना मित्र मान लेते हैं, लेकिन ये “मित्र” अवसर पाकर शोषण ही करते हैं। ये यूनानी ‘सॉफिस्ट्स’ की तरह हैं, जो मानते थे कि “शक्ति ही न्याय है” और नैतिकता की परवाह किए बिना केवल स्वार्थ देखते थे। दिक्कू भी अपने फ़ायदे के लिए हमारी ज़मीन और संसाधन हथियाते हैं।
इसलिए हमें दिक्कुओं को मित्र नहीं, बल्कि ग्राहक और व्यवसायिक साझेदार मानना चाहिए। तभी हम अपनी ज़मीन और गरिमा की रक्षा कर पाएँगे।
सिद्धो की दृष्टि : आगे का रास्ता
सिद्धो मुर्मू का सपना केवल अंग्रेज़ों को हराना नहीं था। उनका सपना था एक ऐसा संताल समाज बनाना, जो गरिमा, सत्य और एकता पर आधारित हो। आज भी वह सपना हमें दिशा दिखा सकता है, यदि हम उसे अपनाएँ:
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संस्कृति के माध्यम से शराब पर रोक
शराब को केवल त्योहारों और अनुष्ठानों तक सीमित रखना चाहिए, न कि दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना। मंजही–परगना व्यवस्था, महिला समूहों और युवाओं को लोकगीतों व नाटकों से जागरूक कर हम इस बुराई को ताक़त में बदल सकते हैं। -
शिक्षा का प्रसार
शिक्षा आज़ादी का आधुनिक हथियार है। संथाली भाषा में विद्यालय, कौशल प्रशिक्षण केंद्र और साक्षरता अभियान आवश्यक हैं। शिक्षा केवल रोज़गार तक सीमित न रहे, बल्कि आत्म-सम्मान और आलोचनात्मक सोच को भी जगाए। -
महिलाओं की गरिमा की रक्षा
संताल महिलाओं को नेतृत्व में आगे लाना और उन्हें समान भागीदार के रूप में सम्मान देना ज़रूरी है। जो समाज अपनी स्त्रियों का सम्मान नहीं करता, वह सिद्धो के सपनों को कभी साकार नहीं कर सकता। -
अंधविश्वास का अंत
ठाकुर जिउ पर आस्था ज्ञान के साथ जुड़ी होनी चाहिए। डायन-बिसाही जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करना और पारंपरिक माध्यमों—गीत, नाटक, बैठक—के ज़रिए वैज्ञानिक चेतना फैलाना ज़रूरी है। -
लालच पर नियंत्रण और एकता की मज़बूती
सिद्धो की कहानी केवल इतिहास नहीं, बल्कि नैतिक दिशा-सूचक है। ईमानदारी, सहयोग और एकता के बल पर ही हम लालच और विघटन को रोक सकते हैं। -
आर्थिक और सांस्कृतिक विकास
कृषि, हस्तशिल्प और वनोपज से टिकाऊ आजीविका बनानी होगी। त्योहार, संगीत और नृत्य केवल मनोरंजन न होकर शिक्षा और एकजुटता के साधन बनने चाहिए।
निष्कर्ष
सिद्धो मुर्मू की विरासत केवल स्मृति नहीं है, बल्कि एक जीवंत पुकार है। उनका संघर्ष केवल अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं था, बल्कि उन सभी ताक़तों के विरुद्ध था जो संताल आत्मा को गुलाम बनाती हैं। आज शराबखोरी, अशिक्षा, अंधविश्वास और लालच हमारे असली दुश्मन हैं।
सिद्धो को याद करना केवल उनके नाम को लेना नहीं है, बल्कि उनके सपनों को जीना है—हमारी परंपराओं से शक्ति लेना, ठाकुर जिउ में आस्था रखना और शिक्षा, समानता व न्याय को अपनाना।
तभी संताल समाज फिर उठ खड़ा होगा—मज़बूत, एकजुट, आत्मसम्मान से भरा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत।

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